वक्त तो बदल गया पर सोच नहीं -अनन्या बिस्वास 

V CARE

अनन्या बिस्वास 

अगर आपको लगता है कि वक्त बदल चुका है और इसी के साथ 21वीं सदी में औरतों की ज़िंदगी भी बदल चुकी है तो आप गलत हैं क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। बल्कि मुझे लगता है कि हालात और ज़्यादा खराब हो चुके हैं। कहने को फेमिनिज़्म उफान पर है और ऐसा दिखाया जाता है कि लड़कियां हर मामले में लड़कों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, लेकिन हकीकत इससे काफी दूर है। सच्चाई लैपटॉप और मोबाइल फोन की स्क्रीन से काफी अलग है।

मैं ये तो मानती हूं कि अब सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों की वजह से औरतों में काफी जागरूकता आई है, जिसकी वजह से अपनी समस्याओं के बारे में उनके लिए खुलकर बोलना आसान हो गया है। लेकिन समस्याओं का समाधान अभी भी नहीं हो पाया है। औरतों की समस्याएं डिजिटल कंटेट के तौर पर तो खूब सुर्खियां बटोर लेती हैं लेकिन क्या सही अंजाम तक पहुंच पाती हैं!

एक औरत होने की वजह से हम किन-किन हालात से गुज़रते हैं, ये औरतों के अलावा और कोई नहीं समझ सकता। लड़कियों को हमेशा से हमारे समाज में एक भोग की वस्तु, मनोरंजन का ज़रिया और पुरुषों की जागीर समझा गया है और अभी भी इन हालात में कुछ खास फर्क आया नहीं है। औरतों की सोच में भले ही कुछ बदलाव आए हों लेकिन मर्दों की सोच और रवैये में कुछ खास फर्क नहीं नज़र आता है। अभी भी रोज़मर्रा के जीवन में किए जाने वाले कुछ बहुत ही आम दिखने वाले काम औरतों के लिए पहाड़ चढ़ने जितने मुश्किल होते हैं।

सड़क पर चलना

आप कहेंगे कि अब इसमें क्या मुश्किल है भला? कभी किसी लड़की से पूछिएगा कि उसे सड़क पर चलते हुए आखिरी बार सुरक्षित कब महसूस हुआ था। चीरहरण करती आंखें, कहीं से भी छू जाने या दबोचने वाले अंजाने हाथ और हर मोड़ पर सुनाई देने वाली सीटियों की गूंज – ये वो चीज़ें हैं, जिनका सामना हर लड़की अपनी ज़िंदगी में रोज़ करती है।

पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफर करना

मेट्रो और बसों में औरतों के लिए एक सीट या एक पूरा डब्बा आरक्षित कर देने से औरतों की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। मेट्रो स्टेशन का प्लेटफॉर्म हो या बस में सफर, औरतों के लिए हर दिन एक जंग की तरह है जहां से रोज़ वो घायल होकर लौटती हैं।

अपनी पसंद के कपड़े पहनना

ये हमारे लिए किसी लक्ज़री से कम नहीं है! अपनी पसंद के कपड़े पहनने पर ना सिर्फ हमें जज किया जाता है बल्कि और कई मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता है। हमारे समाज में लड़कियों के कपड़े अब भी उनका कैरेक्टर आंकने का मापदंड बने हुए हैं।

अंधेरा होने के बाद घर से बाहर रहना

ये तो कहने की बात है कि अंधेरा होने के बाद लड़कियों के लिए घर से निकलना सुरक्षित नहीं है, सुरक्षित तो हम लोग दिन में भी कुछ खास नहीं हैं।

कैब में अकेले सफर करना

ये बात तो हर कोई मानेगा कि तरह-तरह की कैब सर्विसेज़ आ जाने से लोगों को काफी सहूलियत हो गई है लेकिन औरतों के लिए ये सहूलियत भी किसी सिरदर्द जैसी हैं। औरतों के लिए कैब में अकेले सफर करना एक अलग तरह की जद्दोजहद है। हम कैब में आंख लग जाने का रिस्क नहीं ले सकते, रात में एसी बंद करवा के और खिड़की खोल के बैठते हैं जिससे मुसीबत में मदद की गुहार लगा सकें, लगातार किसी करीबी से फोन पर बात करते रहना या उन्हें अपनी जानकारी देते रहना भी इसी जद्दोजहद का हिस्सा है।

जीवन में एक मत रखना

हमारे देश में लोगों को ड्रग्स और हथियार रखने का तो हक है लेकिन लड़कियों को अपना मत रखने का अधिकार नहीं है। घर-गृहस्थी हो या ऑफिस ज़्यादातर जगहों पर लड़कियों के मत या उनकी बातों को आदमियों की तुलना में कम तरजीह दी जाती है।

नौकरी पाना

आज जब लड़कियां स्वाबलंबी होने की कोशिश कर रही हैं और इसी के चलते वो अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरियां कर रही हैं लेकिन लड़कियों के लिए नौकरी पाना मर्दों के मुकाबले कहीं ज़्यादा मुश्किल है। नौकरी देने से पहले उन्हें कई ऐसे सवालों के जवाब देने पड़ते हैं जो मर्दों से कभी भी नहीं पूछे जाते हैं, जैसे कि शादी के बाद नौकरी करोगी या नहीं, फैमिली प्लान के बारे में क्या सोचा है वगैरह-वगैरह।

अपने बारे में पहले सोचना 

ये तो हमारे समाज में लड़कियों को कभी सिखाया ही नहीं जाता है! लड़कियों को हमेशा यही शिक्षा दी जाती है कि अपनों के लिए त्याग करना उनका कर्तव्य है। उन्हें हमेशा से ही खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचना सिखाया जाता है। कहीं अगर कोई लड़की कभी दूसरों से पहले खुद को रख भी लेती है तो उसे स्वार्थी समेत ना जाने कितने ही नाम दे दिए जाते हैं।

किसी पर भरोसा करना

ये तो हम लड़कियों के लिए बहुत ही मुश्किल है! आज के समय में हम किस पर भरोसा करें और किस पर नहीं ये समझ ही नहीं आता है। हर रोज़ जिस तरह की खबरें सुनने और पढ़ने में आती हैं, जहां किसी के दोस्त तो किसी के रिश्तेदार तो किसी के अपने पिता के हाथों उसकी मर्यादा का हनन हुआ है। इसके बाद लड़कियों के लिए ये तय करना कि वो किस पर भरोसा करें, बहुत ही मुश्किल काम है।

सोशल मीडिया पर फोटोज़ शेयर करना

ये हम लड़कियों के लिए एक और कठिन राह है, जहां से अगर हम बिना किसी एक्सिडेंट के सुरक्षित बच निकलते हैं तो ये अपने आप में एक उपलब्धि है। सोशल मीडिया पर फोटोज़ पोस्ट करते वक्त हर लड़की के मन में एक डर लगा रहता है कि किसी ने इन फोटोज़ का गलत इस्तेमाल कर लिया तो या इन्हे एडिट कर के अडल्ट वेबसाइट्स पर डाल दिया तो। सिर्फ इतना ही नहीं सोशल मीडिया पर अकाउंट होना ही अपने आप में एक स्ट्रगल है। अगर आप एक लड़की हैं और आपका किसी भी सोशल मीडिया पर अकाउंट है तो बिन मांगे ही भद्दे कमेंट्स, अश्लील कमेंट्स और डिक पिक्स की बौछार हो जाएगी।

 

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